Jiya khan / Parmatma prasad upadhyay
नई दिल्ली/काठमांडू: भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को जिस कानूनी और रणनीतिक दस्तावेज ने सबसे अधिक मजबूती प्रदान की है, वह है ‘1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मित्रता संधि’। 31 जुलाई 1950 को काठमांडू में हस्ताक्षरित यह संधि आज भी दोनों देशों के बीच विशेष द्विपक्षीय संबंधों का मुख्य आधार स्तंभ बनी हुई है।
संधि का ऐतिहासिक महत्व
इस ऐतिहासिक समझौते पर नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहन शमशेर राणा और भारत के तत्कालीन राजदूत चंदेश्वर नारायण सिंह ने हस्ताक्षर किए थे। यह संधि केवल दो सरकारों के बीच का समझौता नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के नागरिकों के बीच साझा हितों और संप्रभुता के सम्मान का एक वादा है। प्रमुख प्रावधान और नागरिकों को मिलने वाले अधिकार
इस संधि की सबसे अनूठी विशेषता इसकी ‘खुली सीमा’ (Open Border) नीति है। इसके तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे के नागरिकों को ‘राष्ट्रीय व्यवहार’ (National Treatment) देने का संकल्प लिया है:
* मुक्त आवाजाही: दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा या पासपोर्ट के सीमा पार कर सकते हैं।
* रोजगार और निवास: भारतीय और नेपाली नागरिकों को एक-दूसरे के देश में रहने, काम करने और व्यापार करने की पूरी आजादी है।
* संपत्ति का अधिकार: संधि के तहत नागरिकों को दूसरे देश में अचल संपत्ति (घर, जमीन) खरीदने और बेचने का समान अधिकार प्राप्त है।
* सुरक्षा सहयोग: रक्षा मामलों में सहयोग सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान है कि यदि कोई देश अपनी सुरक्षा हेतु हथियार आयात करता है, तो वह दूसरे पक्ष को सूचित करेगा। भारत में नेपाली नागरिकों को विशेष सुविधाएं
1950 की संधि नेपाली नागरिकों को भारत में लगभग भारतीय नागरिकों के समान ही अवसर प्रदान करती है। नेपाली नागरिक भारत के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों (जैसे IIT, NIT) में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाएं ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त, वे आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते जैसी बुनियादी सुविधाएं भी प्राप्त कर सकते हैं, हालांकि वे संवैधानिक पदों (जैसे राष्ट्रपति या न्यायाधीश) पर आसीन नहीं हो सकते और न ही मतदान कर सकते हैं। चुनौतियां और पुनर्विचार की मांग
जहाँ एक ओर यह संधि “रोटी-बेटी” के संबंधों को प्रगाढ़ बनाती है, वहीं समय-समय पर नेपाल की ओर से इसके कुछ सुरक्षा और रक्षा संबंधी प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग भी उठती रही है। इसके बावजूद, यह संधि दक्षिण एशिया में दो देशों के बीच सहयोग का एक अनूठा उदाहरण पेश करती है।