Thursday, February 12, 2026
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​नेपाल में सियासी भूचाल: ‘जेन जी’ आंदोलन ने हिलाई सत्ता की नींव, पीएम ओली का इस्तीफा, अब कौन होगा अगला प्रधानमंत्री?

गुरु जी की कलम से

काठमांडू: नेपाल में बीते कुछ दिनों से चल रहे ‘जेन जी’ (Gen Z) के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक अभिजात्य वर्ग के खिलाफ एक व्यापक जनांदोलन में बदल गया। विरोध प्रदर्शनों के हिंसक रूप लेने के बाद प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे के बाद देश में राजनीतिक संकट गहरा गया है और अब हर किसी की जुबां पर यही सवाल है कि नेपाल का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा?

क्या है ‘जेन जी’ आंदोलन?
​’जेन जी’ आंदोलन मुख्य रूप से 13 से 28 साल के नेपाली युवाओं द्वारा चलाया जा रहा है, जिन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि टिकटॉक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम का उपयोग करके इस विरोध को संगठित किया। इन प्रदर्शनकारियों ने सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध किया, लेकिन बाद में उनका गुस्सा देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, ‘नेपो किड्स’ (राजनेताओं के बच्चे जो खुलेआम अपनी दौलत का प्रदर्शन करते हैं) और राजनीतिक अभिजात वर्ग के खिलाफ भड़क उठा।

प्रदर्शनों ने जल्द ही हिंसक रूप ले लिया, जिसमें सरकारी संपत्तियों, संसद भवन और नेताओं के घरों को आग लगा दी गई। इस हिंसा में 20 से अधिक लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों घायल हुए।
​ओली का इस्तीफा: एक राजनीतिक बदलाव की शुरुआत
​हालात इतने बेकाबू हो गए कि प्रधानमंत्री ओली को 9 सितंबर को अपना इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने अपने त्यागपत्र में ‘असाधारण परिस्थितियों’ का हवाला देते हुए संविधान के अनुसार राजनीतिक समाधान खोजने की बात कही। उनके इस्तीफे के बाद, नेपाल सेना ने पूरे देश में कर्फ्यू लगाकर शांति बहाल करने का जिम्मा संभाला है।

संभावित प्रधानमंत्री उम्मीदवार: किसकी दावेदारी सबसे मजबूत?
​ओली के इस्तीफे के बाद नेपाल में राजनीतिक शून्यता की स्थिति बन गई है। फिलहाल देश को एक अंतरिम सरकार की जरूरत है जो नए चुनावों तक सत्ता की बागडोर संभाले। विभिन्न राजनीतिक दल और युवा आंदोलन के नेता भी प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।
​प्रमुख संभावित उम्मीदवार और उनकी संभावनाएँ:
​कुलमान घिसिंग (Kulman Ghising): नेपाल विद्युत प्राधिकरण (NEA) के पूर्व प्रबंध निदेशक कुलमान घिसिंग एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में नेपाल से बिजली संकट को समाप्त किया था, जिसके कारण वे जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं। उनकी छवि एक ईमानदार और सक्षम प्रशासक की है। ‘जेन जी’ आंदोलन के कई नेता और विश्लेषक उन्हें अगला प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से बाहर के व्यक्ति हैं। उनकी लोकप्रियता और साफ-सुथरी छवि उन्हें इस दौड़ में सबसे आगे रखती है।
​बालेंद्र शाह (Balendra Shah): काठमांडू के लोकप्रिय मेयर बालेन शाह भी युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुने गए बालेन शाह को भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा माना जाता है। उनकी ‘जेन जी’ आंदोलन के साथ गहरी सहानुभूति है। हालांकि, मेयर के रूप में उनकी भूमिका और राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव की कमी उनके लिए चुनौती बन सकती है।
​रबि लमिछाने (Rabi Lamichhane): राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के अध्यक्ष रबि लमिछाने भी एक मजबूत दावेदार हैं। उनकी पार्टी को युवाओं का भरपूर समर्थन प्राप्त है। वे एक पूर्व टीवी पत्रकार हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई कार्यक्रम चलाए थे। उनकी पार्टी इस राजनीतिक संकट में एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकती है।
​सुशीला कार्की (Sushila Karki): नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की भी प्रधानमंत्री पद के लिए एक संभावित चेहरा हैं। उनकी न्यायिक पृष्ठभूमि और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख उन्हें एक विश्वसनीय उम्मीदवार बनाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस अशांति के समय में एक अनुभवी और सम्मानित व्यक्ति को सत्ता की बागडोर संभालनी चाहिए।
​ज्यादा संभावना किसकी?
​कुलमान घिसिंग की छवि और जनता के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए, उन्हें अगला प्रधानमंत्री बनने की सबसे अधिक संभावना है। ‘जेन जी’ आंदोलन के नेता भी मौजूदा राजनीतिक दलों के नेताओं पर भरोसा नहीं करना चाहते हैं और इसलिए वे एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो घिसिंग के पक्ष में जाता है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि नेपाल के राजनीतिक दल इस बात पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं और क्या वे एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति को सत्ता सौंपने के लिए तैयार होते हैं।

नेपाल में यह राजनीतिक उथल-पुथल अभी जारी है और देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीतिक दल और आंदोलन के नेता मिलकर किस तरह का समाधान निकालते हैं।