Thursday, February 12, 2026
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अपने हितों से समझौता नहीं करेगा नेपाल , केपी शर्माओली प्रधानमंत्री नेपाल नेपाल-चीन संबंध पर खास रिपोर्ट

परमात्मा प्रसाद उपाध्याय

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन के दौरे पर वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात किया। वह शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में भाग लेने तथा द्वितीय विश्व युद्ध की 80वीं वर्षगांठ पर आयोजित चीनी सैन्य परेड में भी शामिल होंगे।
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्माओली ने चीन की नेतृत्व वाली सुरक्षा ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव से किनारा कर लिया। नेपाल ग्लोबल सिविलाइजेशन इन सीनियटिब का भी हिस्सा बनने से इनकार किया है।

जीएस आईं चीन का नाटो जैसा गठबंधन है। दोनों नेताओं के बैठक के बाद नेपाली दूतावास और चीनी विदेश मंत्रालय ने अपने-अपने बयान जारी किए हैं लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति की एक ही बैठक के बाद दोनों पक्षों के द्वारा जारी बयान एक दूसरे से मेल खाते नहीं दिखते हैं।

उनमें विरोधाभास है। खास कर लिपु लेख और नेपाल द्वारा जीएस आईं और जीडीआई और जीसीआई के समर्थन के मुद्दे पर विरोधाभास साफ दिखाई देता है राजदूत विष्णु पुकार श्रेष्ठ के हवाले से कहा गया है कि जी सीआई पर नेपाल का रूख़ जीएस आईं जितना कठोर नहीं था हम जीएस आईं को पूरी तरीके से खारिज करते हैं इधर नेपाल के बयान में जहां लिपु लेख मुद्दा को प्रमुखता दी गई है वहीं चीन के बयान में यह लिपु लेख मुद्दा ही गायब है।

चीनी विदेश मंत्रालय के बयान में जीडीआइ और जीएसआइ और जीसी आईं के बारे में नेपाल द्वारा समर्थन की बात कही जा रही है वहीं नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के साथ नेपाल के मंत्रियों अधिकारियों सहयोगियों की टीम जो चीन की यात्रा पर गए हैं
उन्होंने चीनी विदेश मंत्रालय के दावों को खारिज कर दिया है नेपाल के संस्कृतिपर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री बद्री पांडे ने कहा है की नेपाल के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति के बीच की बैठक में इस तरह का कोई मुद्दा य एजेंडा नहीं उठाया गया है और ना ही इस पर कोई चर्चा ही की गई है सबसे आश्चर्य की बात यह है कि नेपाल की तरफ से चीनी दावे को आधिकारिक तौर पर खारिज करने के संबंध में कोई बयान भी नहीं दिया गया है।

भारत-चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से रुपए-युआन में व्यापार होगा:पहले सामान के बदले सामान का लेन-देन होता था; यहां मनी एक्सचेंज भी खुलेगा।

भारत और चीन ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से फिर व्यापार शुरू करने पर सहमति जताई है। यह फैसला 18-19 अगस्त2025 को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान हुआ। लिपुलेख के साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों से भी कारोबार बहाल करने का फैसला लिया गया है।

हिमालय के तीन दर्रों से शुरू होने जा रहा भारत-चीन व्यापार पहली बार पूरी तरह सड़क के जरिए होगा। सबसे अहम यह है कि व्यापार अब भारतीय रुपए और चीनी युआन में होगा। अब तक यह ‘वस्तु विनिमय’ आधारित था।

तिब्बत से व्यापारी नमक, बोराक्स, पशु उत्पाद, जड़ी-बूटियां और स्थानीय सामान बेचने आते हैं, जबकि भारतीय व्यापारी बकरी, भेड़, अनाज, मसाले, गुड़, मिश्री, गेहूं वहां ले जाते हैं।

हालांकि, नेपाल ने इस समझौते पर आपत्ति जताई। उसका कहना है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। उसने भारत और चीन से इस इलाके में कोई एक्टिविटी न करने की अपील की है।

अंग्रेजों और नेपाल की बीच चली लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच 2 दिसंबर, 1815 को एक संधि हुई, थी जिसे सुगौली की संधि कहा जाता है।
बिहार के चंपारण में स्थित सुगौली में हुई इस संधि पर 4 मार्च, 1816 को नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र के सहायक चंद्रशेखर उपाध्याय और ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने दस्तखत किए थे। अंग्रेजों को यह डर था कि शायद नेपाल इस संधि को लागू न करे। ऐसे में तत्कालीन गवर्नर जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने ब्रिटिश सरकार की ओर से संधि पर उसी दिन आनन-फानन में मुहर लगा दी

इस संधि की कॉपी चंद्रशेखर उपाध्याय को सौंप दी थी
दरअसल, आज इस कहानी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि नेपाल ने 100 रुपए के नए नोट छापने का ऐलान किया था। इस नोट पर ऐसा मानचित्र होगा जिसमें भारत के लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को दर्शाया जाएगा। भारत इन इलाकों को लेकर पहले भी कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका है।

भारत ने कहा है कि ये तीनों इलाके भारत के अहम हिस्से हैं। इससे पहले 18 जून, 2020 को नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन करके रणनीतिक रूप से अहम तीन इलाकों लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया था, तब भी भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी।

नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद से स्थिर लोकतंत्र कभी आया ही नहीं। वहां पर चीन का प्रभाव इतना ज्यादा रहा है कि आज भी नेपाल की कई सरकारें भारत के खिलाफ बयानबाजी से बाज नहीं आतीं हैं
। चीन वहां पर निर्माण कार्य के अलावा नेपाल के संविधान और प्रशासन में भी परोक्ष रूप से अपना‌‌दखल देता रहता है
सुगौली की संधि से नेपाल ने बीते 25 साल में राजाओं के जीते और कब्जे किए हुए क्षेत्रों का करीब एक-तिहाई हिस्सा गंवा दिया। इसमें पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल राजशाही और दक्षिण में तराई का अधिकतर क्षेत्र शामिल था।
तराई भूमि का कुछ हिस्सा 1816 में ही नेपाल को लौटा दिया गया था। 1860 में तराई भूमि का एक बड़ा हिस्सा नेपाल को 1857 के भारतीय विद्रोह को दबाने में ब्रिटिशों की सहायता करने की एवज में पुन: लौटाया गया।
इस संधि से काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति की जानी थी और ब्रिटिश आर्मी में गोरखाओं की भर्ती की राह खुली। दिसंबर, 1923 में सुगौली संधि को ‘सतत शांति और मैत्री की संधि’ कहा जाने लगा और संधि में ब्रिटिश प्रतिनिधि की जगह सिर्फ दूत कर दिया गया।
1950 में भारत-नेपाल ने एक नई संधि पर दो स्वतंत्र देशों के रूप में हस्ताक्षर किए, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच संबंधों को नए सिरे से स्थापित करना था।

के. पी. शर्मा . ओली ने शनिवार (31 अगस्त) को तियानजिन में द्विपक्षीय वार्ता के दौरान शी जिनपिंग से यह बात कही. नेपाली पीएम और चीनी राष्ट्रपति की यह बैठक तियानजिन में आयोजित 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन और SCO प्लस बैठक से ठीक पहले हआ है।

नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राय ने इस संबंध में एक बयान जारी किया है. उन्होंने कहा, ‘ओली ने शी जिनपिंग को याद दिलाया कि सुगौली संधि में महाकाली नदी को सीमा रेखा के रूप में तय किया गया था और नदी के पूर्व दिशा में स्थित सभी इलाकों को नेपाल का हिस्सा बताया गया है, जिसमें लिपुलेख भी शामिल है.

राय ने कहा, ‘चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से द्विपक्षीय बैठक में मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ओली ने लिपुलेख मुद्दे को भी उठाया. इस मामले में उन्होंने स्पष्ट किया कि 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक महाकाली नदी के पूर्व दिशा में पड़ने वाले सभी क्षेत्र नेपाल के हैं. ऐसे में चीन को लिपुलेख इलाके का व्यापार के लिए इस्तेमाल करने वाले इस समझौते का समर्थन नहीं करना चाहिए, क्योंकि नेपाल को इस भारत-चीन के बीच हुए इस समझौते पर आपत्ति है. यह स्पष्ट संदेश राष्ट्रपति शी जिनपिंग तक पहुंचाया गया.

विदेश सचिव के अलावा, नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी पीएम के. पी. शर्मा ओली के इस रुख को दोहराते हुए नेपाल के पक्ष को स्पष्ट रूप से रखा. PMO ने अपने बयान में कहा, ‘राष्ट्रपति शी के साथ बैठक में पीएम ओली ने स्पष्ट रूप से लिपुलेख के नेपाली इलाके को व्यापार का रास्ता बनाने के भारत-चीन समझौते पर नेपाल की आपत्ति जताई..के पी शर्मा. ओली ने इस संबंध में सीधे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपना संदेश दिया.