Saturday, October 10, 2026
बढ़नी

निविदा प्रकाशन के नाम पर सरकारी बजट का वंशावली खेल: बैंक खातों में फर्जीवाड़ा या जिम्मेदारों की मिलीभगत?

गुरु जी की कलम से

सिद्धार्थनगर जिले के विकास खंड बढ़नी अंतर्गत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की निविदा (टेंडर) प्रकाशन के नाम पर भारी वित्तीय अनियमितता का मामला गरमाता जा रहा है। आरोप है कि दैनिक समाचार पत्रों में निविदाएं प्रकाशित कराने के बाद उसका भुगतान नियमानुसार संबंधित समाचार पत्र या अधिकृत एजेंसी के आधिकारिक खाते में न करके, मनमाने ढंग से निजी बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया है। सरकारी धन के इस तरह संदिग्ध खातों में बंदरबांट होने से प्रशासनिक हलके में हड़कंप मच गया है और जिम्मेदारों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकारी खजाने में सेंध: नियमों की उड़ाई गईं धज्जियां

नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी योजना या विकास कार्य के निविदा प्रकाशन का भुगतान केवल संबंधित मीडिया संस्थान या उसके पंजीकृत और अधिकृत खाते में ही किया जा सकता है। लेकिन बढ़नी विकास खंड में बिल-वाउचर लगाकर जिस तरह निजी खातों में पैसा भेजा गया है, वह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और गबन की ओर इशारा करता है। आखिर किस अधिकार के तहत सरकारी राशि को निजी बैंक खातों में हस्तांतरित किया गया? यह कोई तकनीकी चूक है या फिर मिलीभगत से रची गई सोची-समझी साजिश?

उठते तीखे सवाल: कटघरे में जिम्मेदार अधिकारी

  • फर्जीवाड़े का दायरा: क्या निविदाएं वास्तव में समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई भी थीं, या महज फर्जी बिल-वाउचर लगाकर भुगतान उठा लिया गया?

  • खातों का रहस्य: निविदा भुगतान की राशि आखिर किस व्यक्ति और किस बैंक खाते में भेजी गई? उस खाताधारक का इस प्रक्रिया से क्या संबंध है?

  • अभिलेखों की सत्यता: भुगतान स्वीकृति के लिए फाइल में कौन-कौन से अभिलेख लगाए गए थे और जांच-परख किए बिना बिल पास कैसे हो गए?

  • मौन प्रशासनिक रवैया: इतने गंभीर मामले के बाद भी संबंधित विभाग के बड़े अधिकारी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं?

ग्राम पंचायतवार निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

इस पूरे प्रकरण ने निष्पक्ष पारदर्शिता का ढोंग रचने वाले तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। स्थानीय लोगों और प्रबुद्ध वर्ग ने मांग की है कि पूरे मामले की ग्राम पंचायतवार उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में यह साबित होता है कि सरकारी धन का भुगतान निजी खातों में हुआ है, तो इसमें लिप्त कर्मचारियों, अधिकारियों और संदिग्ध खाताधारकों पर तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस भ्रष्टाचार की परतें खोलकर दूध का दूध और पानी का पानी करेंगे, या फिर अन्य वित्तीय घोटालों की तरह इस मामले को भी लीपापोती कर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?