विश्व में शिक्षक दिवस की शुरुआत 5 अक्टूबर सन 1994 को हुई थी जबकिभारत भारत में शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा की शुरुआत 5 सितंबर सन 1962 से हुआ था
शिक्षक दिवस, महान दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बाद द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है डॉक्टर राधाकृष्णन का दार्शनिक चिन्तन, जीवन मूल्यों को लोकजीवन में संचारित करने की दृष्टि एवं गिरते सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा का संकल्प कालजयी है जो युगों-युगों तक राष्ट्र एवं समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा
, उनका जन्म दिवस 5 सितम्बर पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमारे एक ऐसे ही प्रकाश-स्तंभ हैं, जिन्होंने अपनी बौद्धिकता, सूझबूझ, व्यापक सोच से भारतीय संस्कृति के संक्रमण दौर में संबल प्रदान किया। वे भारतीय संस्कृति के ज्ञानी, एक महान् शिक्षाविद, महान् दार्शनिक, महा-मनीषी अध्येता, समाज-सुधारक, राजनीतिक चिन्तक एवं भारत गणराज्य के राष्ट्रपति थे
। वे समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है और यही आदर्श समाज के संरचना का आधारहै
भारत में शिक्षक दिवस की शुरुआत सन 1962 में हुई थी इसके पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कहानी है बताया जाता है कि जब सन 1962 में सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बनाए गए तब उनके कुछ पुराने छत्र उनसे मिलने गए और उन लोगों ने उनसे कहा कि आपका जन्म दिवस हम लोग मनाना चाहते हैं इस पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा कि उनका जन्मदिन मनाने का सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि यह दिन शिक्षकों को समर्पित कर दिया जाए तब से 5 सितंबर को सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन का जन्म दिवस शिक्षक दिवस के रूप में पूरे देश में मनाये जाने की परंपरा चली आ रही है
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के एक महान विद्वान शिक्षक राजनेता के साथ दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता से उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी गांव में हुआ था
डॉक्टर सर्वपल्ली रधाकृष्णन एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे उनके शिक्षा की विचारों ने उन्हें महान बना दिया
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पस MAएम एसे लेकर मानद डीलिट
यल यलडी डीसीएल
लिट डी
डीऐल यफ आर यस यल यफ बीए
जैसी प्रतिष्ठित डिग्रियां थी उनको ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के आल सोल्स कॉलेज का मानक फेलो भी बनाया गया था उनकी योग्यता और क्षमता को देखते हुए 1909 में मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज के दर्शन शास्त्र विभाग में नियुक्त किया गया था सन 1918 में वे मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने थे जहां महाराजा कॉलेज में रहते हुई उन्होंने दक्वे स्ट कॉलेज जनरल ऑफ़ बिलासपुर और इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फिलासफी जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखे सन 1921 में कोलकाता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने सन 1926 में ब्रिटिश अंपायर यूनिवर्सिटी कांग्रेस लंदन और इंटरनेशनल कांग्रेस आफ फिलासफी हा वर्ड में भारत का प्रतिनिधित्व किया था
सन 1929 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मैनचेस्टर यूनाइटेड कॉलेज में उन्होंने एन आई ड लिस्ट व्यू ऑफ़ लाइफ पर व्याख्यान दिया था 1931 में ब्रिटेन के सम्राटजॉर्ज पंचम में उन्हें नाइट की उपाधि दिया थ जिसे उन्होंने स्वतंत्रता के बाद हटा दिया
सन 1936 में वे आल सोल्स कॉलेज आक्सफोर्ड के फेलो और स्पालिंडिग प्रोफेसर नियुक्त किए गए थे उन्होंने हिंदू धर्म की गहराइयों को वैश्विक मंच पर रखा था वह केवल भारतीय दर्शन में ही नहींबल्कि पश्चात दर्शन मेंसहज रूप से संबंध रखते थे सन 1954 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था
भारत के बौद्धिक और शैक्षिक परिदृश्य को आकार देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी सन 1952 में भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और सन 1962 में भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में डॉक्टर सर्वपल्ली राधा कृष्णन सक्रिय रूप सेशामिल नहीं थे
लेकिन उनके विचारों और लेखो ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उन्होंने अध्यात्मवाद और मानवता वाद पर ज़ोर दिया था उन्होंने शिक्षा को मानवता के विकास के लिए आवश्यक बताया उनके अनुसारशिक्षक राष्ट्र के निर्माता होते हैं वह एक महान शिक्षक विचारक नेता के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने अपनी शिक्षा और संस्कृति को भारतीय समाज में नई ऊंचाईयां दिया