Guest columnDr Ved Mitr Shukla
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में राजभाषा कार्यान्वयन समिति और हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर राजभाषा हिंदी पखवाड़े (14 से 30 सितंबर 2025) का भव्य शुभारंभ हुआ। इस कार्यक्रम में ‘विकसित भारत के लिए राजभाषा हिंदी का महत्व’ विषय पर एक संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया।
इस अवसर पर मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) करुणाशंकर उपाध्याय ने मुख्य अतिथि के रूप में कहा, “स्वभाषा से प्रेम किसी भी राष्ट्र के विकास की पहली शर्त है। हिंदी केवल भारत की आत्मा को ही नहीं जोड़ती, बल्कि यह पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है।”
उन्होंने हिंदी की वैश्विक स्थिति और उसके बदलते स्वरूप पर भी विस्तार से बात की।
जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) नीरज कुमार ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर युवाओं से हिंदी को तकनीक के साथ जोड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “आज जब हिंदी वैश्विक स्तर पर पढ़ाई जा रही है और इसमें सर्वाधिक समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे हैं, तब इसे रोजगार की भाषा के रूप में देखा जाना चाहिए।” उन्होंने हिंदी को उसका ‘सही और समुचित दर्जा’ दिलाने के लिए ठोस प्रयास करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
कॉलेज के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) दर्शन पांडेय ने कहा कि हिंदी भाषा को केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे कार्यालयों और कार्यस्थलों पर व्यवहार की भाषा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने छात्रों को अपनी अभिव्यक्ति में हिंदी का आत्मविश्वास के साथ उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में राजभाषा कार्यान्वयन समिति के संयोजक डॉ. वेद मित्र शुक्ल ने पखवाड़े के दौरान आयोजित होने वाले विभिन्न साहित्यिक और रचनात्मक कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसमें वाद-विवाद, काव्य-पाठ और निबंध लेखन जैसी प्रतियोगिताएं शामिल हैं।
हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. जसवीर त्यागी ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा, “हिंदी केवल एक दिवस की नहीं, बल्कि हर दिन की भाषा होनी चाहिए।” इस उद्घाटन समारोह में प्रख्यात हिंदी विद्वानों, शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अर्चना त्रिपाठी और डॉ. श्रुति झा ने सुचारू रूप से किया।